History of Jagannath Temple

History of Jagannath Temple

History of Jagannath Temple बद्रीनाथ, रामेश्वरम, द्वारिका एवं पूरी  इन चारों पुण्य क्षेत्रों को साथ में चार धाम कहते हैं भक्तों का विश्वास है कि श्री कृष्ण जी  निर्वाण प्राप्त करने के बाद  शिल्ह रूप में आज भी पूरे जगन्नाथ थालय में बसते हैं|

 बहती हवा के विरुद्ध दिशा में लहराता ध्वज 

 नगर में कहीं से भी एक समान दिखने वाली श्री कृष्ण सुदर्शन चक्र

 प्रकृति के नियमों के विरुद्ध प्रवाह करते समुद्र की हवाएं  और कई  ऐसी हैरान कर देने वाली बातें सच में मजबूर कर देते हैं यह मानने को कि वे श्री कृष्ण भगवान जी, उड़ीसा में उपस्थित पुरी जगन्नाथ मंदिर में अपनी मौजूदगी का अहसास करवाते हैं|

पुरी में जगन्नाथ मंदिर कैसे स्थापित हुआ साइंस को ही सवाल करने वाली यह मंदिर के बारे में जानेंगे|

श्री कृष्ण भगवान जी अपने अवतार का सत्रावसान करने के बाद उनके शरीर का दहन करने के पश्चात नाभि का भाग बचा हुआ था कई प्रयत्नों के बाद भी दहन नहीं हो पा रहा था तब उस नाभि को समुद्र में मिला दिया गया|

कुछ समय पश्चात निल रंग के  विष्णु मूर्ति के रूप में  एक शिल्ह सा बदलकर  विश्वाबस  नामक एक गिरी जननायक को मिला उन्होंने उसको समीप के जंगल में एक रहस्यमई जगह पर स्थापित करके नील माधव के नाम से अत्यंत भक्ति भाव से उनकी पूजा करने लगे|

कहीं से इस बात की खबर राजा इंद्रद्युम्न को लग जाती है|  राजा उस रहस्य का पता करने विद्यापति नामक एक ब्राह्मण युवक को जंगल भेज देते हैं जो विश्वाबस की पुत्री से विवाह करता है इस मूर्ति को दिखाने की विनती को बार-बार डालते हुए आते विश्वा बस 1 दिन दामाद को इनकार नहीं कर पाए उसकी आंखों पर पट्टी बांधकर मंदिर के पास आदमी लेकर जाते हैं विद्यापति चालाकी से रास्ते में फूलों के  बीज  खिसका देता है  कुछ दिनों के बाद जब अंकुरित होते हैं तो वह मार्ग स्पष्ट रूप से दिखाई देता है|

 इसके बाद विद्यापति फौरन राजा को खबर पहुंचाता है राजा जी के पहुंचने पर नील माधव जी की मूर्ति गायब हो जाती है इस बात पर बड़े निराश राजा जी अश्वमेघ यज्ञ रखते हैं|

 प्रस्तुत समय के जगन्नाथ जगन्नाथ आले के समीप ढाई किलो मीटर की दूरी पर गुंडिचा मंदिर के स्थान पर यज्ञ वाटिका का निर्माण करके उसमें अश्वमेध यज्ञ करते हैं|

एक दिन उनको साक्षात श्री कृष्ण प्रकट होकर यह सूचना देते हैं कि समुद्र के किनारे एक दिव्य लकड़ी का कुंदा मिलेगा, उसी लकड़ी से मूर्तियों को स्थापित करने के आदेश देते हैं|

History of Jagannath Temple

 ठीक वैसे ही राजा को वहीं पर लकड़ी का कुंडा मिल जाता है तो फौरन राज्य के बेहतरीन शिल्पकारों को निमंत्रण देते हैं लेकिन आश्चर्य तब होता है जब महान से महान  शिल्पकार  का साधन लकड़ी से स्पर्श करते ही चकनाचूर हो जाता है यह  देख राजा चिंता में पढ़ते हैं तब साक्षात दिव्य शिल्पी विश्वकर्मा स्वयं एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में आकर कहते हैं कि वह इस कार्य को पूर्ण करेंगे परंतु  वह यह कार्य कक्ष में एकांत में करना चाहेंगे| 

और उन 21 दिनों में वह ना जल ग्रहण करेंगे ना ही भोजन ग्रहण करेंगे तथा उस कक्ष से कोई भी न गुजरे और उनके काम को भंग ना करें |

दिन गुजरते जाते हैं लेकिन उस कक्ष से कोई आवाज नहीं आती इस पर रानी गुंडिजा देवी आग्रह करती है कि देखकर आए आखिर क्या हुआ इससे राजा जी समय से पूर्व ही दरवाजा खुलवा दे देते हैं |

 वहां वह ब्राह्मण नहीं थे लेकिन श्री कृष्ण जी और उनकी बहन सुभद्रा और उनके भाई बलराम के रूप में तीन मूर्तियां थी परंतु वह असंपूर्ण यानी कि कमर के नीचे का भाग और हाथ नहीं थे पश्चाताप से राजा जी ब्रह्मा देव जी से प्रार्थना करते हैं चतुर्मुखी वहां प्रत्यक्ष होकर यह बोलते हैं कि इसके पश्चात वह मूर्तियां इसी रूप में पूजी जाएगी|  वही मूर्तियां पुरी जगन्नाथ धाम में स्थित है| History of Jagannath Temple

Mind Blowing Facts about jagannath temple.

Science भी आज तक इनका जवाब नहीं ढूंढ पाया है

 हवा के विपरीत लहराता ध्वज श्री जगन्नाथ मंदिर के ऊपर स्थापित लाल ध्वज सदैव हवा के विपरीत दिशा में लहराता है ऐसा किस कारण होता है यह तो वैज्ञानिक ही बता सकते हैं लेकिन यह निश्चित ही आश्चर्यजनक बात है यह भी आश्चर्य है प्रतिदिन  शाम के समय, मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मानव द्वारा उल्टा चढ़ कर बदला जाता है  मंदिर की चोटी लगभग 214 फुट है जो कि लगभग 21 स्टोरी बिल्डिंग जितना ऊंचा है History of Jagannath Temple

The Shadow of The main Dome is Invisible at any time of the day

गुंबद की छाया नहीं बनती यह दुनिया का सबसे भव्य और ऊंचा मंदिर है यह मंदिर 400000  वर्ग फुट क्षेत्र में फैला है  इसकी ऊंचाई लगभग 214 फुट है मंदिर के पास खड़े रहकर इस का गुंबद देख पाना असंभव है 

चमत्कारी सुदर्शन चक्र

पूरी में किसी भी स्थान से आप मंदिर के शीर्ष पर लगे सुदर्शन चक्र को देखेगे तो वह आपको सदैव अपने सामने ही लगा दिखेगा इसे निलचक्र भी कहते हैं यह अष्ट धातु से निर्मित है और अति पावन और पवित्र माना जाता है

 सामान्य दिनों के समय समुद्र से जमीन की तरफ हवा आती है और शाम के दौरान इसके विपरीत लेकिन पूरी में इसका उल्टा होता है 

मंदिर के गुंबद के आसपास अब तक कोई पक्षी उड़ता हुआ नहीं देखा क्या इसके ऊपर से विमान नहीं उड़ाया जा सकता  इसके ऊपर से उड़ाए गए विमान की दिशा अपने आप ही बदल जाती है #History_Of_JagannathTemple

 दुनिया का सबसे बड़ा रसोई घर 

500 रसोइए 300 सहयोगियों के साथ बनाते हैं भगवान जगन्नाथ जी का प्रसाद लगभग 20 लाख भक्त कर सकते हैं यहां भोजन|

कहा जाता है कि मंदिर में प्रसाद कुछ हजार लोगों के लिए ही क्यों ना बनाया गया हो लेकिन इससे लाखों लोगों का पेट भर सकता है प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती

 मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं और सब कुछ लकड़ी पर ही पकाया जाता है इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर नीचे की तरफ एक के बाद एक पकते जाती है|

समुंद्र की ध्वनि

 मंदिर के द्वार में पहला  कदम रखते ही आप समुद्र द्वारा निर्मित किसी भी ध्वनि को नहीं सुन सकते आप मंदिर के बाहर से एक ही कदम को पार करें तब आप इसे सुन सकते हैं

 विश्व की सबसे बड़ी रथ यात्रा

 आषाढ़ मास में भगवान रथ पर सवार होकर अपनी मौसी रानी गुंडिजा के घर जाते हैं यहां रथयात्रा 5 किलोमीटर में फैले पुरुषोत्तम क्षेत्र में ही होती है रानी गुंडिजा भगवान  जगन्नाथ के परम भक्त राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी थी इसलिए रानी को भगवान जगन्नाथ की मौसी कहा जाता है अपनी मौसी के घर भगवान 8 दिन रहते हैं

 हनुमान जी करते हैं भगवान जगन्नाथ की समुद्र से रक्षा

 माना जाता है कि तीन बार समुद्र में जगन्नाथ जी के मंदिर को तोड़ दिया था कहते हैं कि प्रभु जगन्नाथ ने मारुति यानी कि हनुमान जी को यहां समुंदर को नियंत्रण करने हेतु नियुक्त किया था

 परंतु जब तब हनुमान जी भी जगन्नाथ, बलराम एवं सुभद्रा की दर्शन के लिए मंदिर  में प्रवेश कर जाते थे  ऐसे में समुंद्र भी उनके पीछे-पीछे नगर में प्रवेश कर जाता था

 केसरी नंदन हनुमान जी की आदत से परेशान होकर जगन्नाथ  महाप्रभु ने हनुमान जी को यहां स्वर्ण  बेड़ी से आवध कर दिया|

 यहां जगन्नाथ पुरी सागर तट पर बेड़ी हनुमान का प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है

History of Jagannath Temple

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